किसान विमर्श : वर्तमान संदर्भ में किसान की स्थिति, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ

105

किसान विमर्श : वर्तमान संदर्भ में किसान की स्थिति, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ

भारतीय सभ्यता का मूल आधार कृषि रही है। प्राचीन काल से लेकर आज तक किसान केवल अन्न उत्पादक ही नहीं, बल्कि समाज की जीवन-रेखा रहा है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, क्योंकि यहाँ की बड़ी जनसंख्या आज भी कृषि पर निर्भर है। किसान केवल भोजन ही नहीं उगाता, बल्कि वह राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को भी मजबूती प्रदान करता है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि जो व्यक्ति संपूर्ण समाज के जीवन का आधार है, वही स्वयं अनेक समस्याओं और संघर्षों से घिरा हुआ है। किसान विमर्श आज इसलिए आवश्यक हो गया है क्योंकि समय के साथ किसान की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। आधुनिकता, तकनीकी विकास और सरकारी योजनाओं के बावजूद किसान आज भी आर्थिक, सामाजिक और मानसिक दबावों से जूझ रहा है। 21वीं सदी में किसान विमर्श को अस्मितामूलक विमर्श के रूप में स्थापित करने का श्रेय युवा किसानवादी विचारक गिरजाशंकर कुशवाहा ‘कुशराज’ को जाता है। कुशराज जी 19 अक्टूबर 2019 को ‘कुसराज की आबाज’ पर प्रकाशित अपने लेख ‘किसान विमर्श’ में किसान विमर्श को परिभाषित करते हुए लिखते हैं – किसान के जीवन पर लिखा गया अनुभूतिपरक एवं स्वानुभूतिपरक साहित्य ही किसान साहित्य है और ऐसा विमर्श जिसमें किसानों हर मनोदशा, भावना और अधिकारों की अभिव्यक्ति हुई हो, वो किसान विमर्श है। कुशराज जी किसान विमर्श को पाठ्यक्रम में शामिल करने की वकालत करते हुए लिखते हैं – किसानों को अब से समाज, साहित्य, राजनीति और सिनेमा में अगल से सम्मानीय दर्जा दिया जाए। दुनिया के हर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के हर कक्षा के पाठ्यक्रमों में किसान साहित्य और किसान विमर्श को अनिवार्यता के साथ शामिल किया जाए। क्योंकि किसानों के बिना ये दुनिया नहीं चल सकती। इसलिए किसानों की हर माँग को पूरा किया जाए।

यदि कालक्रम के आधार पर किसान की स्थिति को देखें तो प्राचीन काल में किसान को समाज में सम्मान प्राप्त था। कृषि को पवित्र कर्म माना जाता था और किसान को अन्नदाता कहकर सम्मान दिया जाता था। उस समय खेती प्राकृतिक साधनों पर आधारित थी, लागत कम थी और आवश्यकताएँ भी सीमित थीं। किसान आत्मनिर्भर था तथा भूमि उसके जीवन का मुख्य आधार थी। मध्यकाल में सामंती व्यवस्था के कारण किसान पर करों का भार बढ़ा, जिससे उसकी स्थिति कमजोर हुई। अंग्रेजी शासनकाल में किसानों का शोषण अत्यधिक बढ़ गया। लगान की कठोर व्यवस्था, नकदी फसलों की बाध्यता और प्राकृतिक आपदाओं के कारण किसान आर्थिक रूप से टूटने लगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उम्मीद थी कि किसान की स्थिति में सुधार होगा, किंतु धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि योजनाओं और नीतियों के बावजूद किसान अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझता रहा।

वर्तमान समय में किसान अनेक जटिल समस्याओं से घिरा हुआ है। सबसे बड़ी समस्या आर्थिक अस्थिरता की है। खेती की लागत निरंतर बढ़ रही है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मशीनरी के दाम बढ़ते जा रहे हैं, जबकि फसल का उचित मूल्य किसान को नहीं मिल पाता। बाजार व्यवस्था में बिचौलियों की भूमिका अधिक होने के कारण किसान को अपनी उपज का वास्तविक मूल्य प्राप्त नहीं होता। मौसम की अनिश्चितता भी किसान के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। जलवायु परिवर्तन के कारण कभी सूखा, कभी बाढ़ और कभी असमय वर्षा फसलों को नुकसान पहुँचाती है। प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक प्रभाव किसान पर ही पड़ता है, क्योंकि उसकी पूरी आय फसल पर निर्भर होती है।

भूमि का निरंतर छोटा होना भी किसान की समस्या है। बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि भूमि का विभाजन होता गया और जोत का आकार छोटा होता गया। छोटी जोत पर आधुनिक तकनीक का उपयोग करना कठिन हो जाता है, जिससे उत्पादन कम होता है। इसके अतिरिक्त कर्ज की समस्या भी किसान को मानसिक रूप से परेशान करती है। कई बार फसल खराब होने पर किसान कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता है और निराशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यही कारण है कि कई किसान आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाने को विवश हो जाते हैं, जो समाज के लिए अत्यंत दुखद और चिंताजनक है।

किसान को उसके हिस्से का सम्मान इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि समाज में श्रम की अपेक्षा उपभोग को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। आधुनिक समाज में नौकरी और व्यवसाय को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है, जबकि खेती को पिछड़ेपन से जोड़ दिया जाता है। शहरों में रहने वाला व्यक्ति किसान के परिश्रम को समझ नहीं पाता। जिस अन्न को वह सहजता से प्राप्त करता है, उसके पीछे किसान की मेहनत, त्याग और संघर्ष छिपा होता है। किसान दिन-रात खेत में परिश्रम करता है, फिर भी उसकी आय निश्चित नहीं होती। सामाजिक दृष्टि से भी किसान को वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसका वह अधिकारी है।

सरकारों की भूमिका किसान की स्थिति सुधारने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जिससे किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिल सके। न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है। कृषि में आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाने के लिए सरकार को प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए। सिंचाई की व्यवस्था को मजबूत करना भी आवश्यक है, क्योंकि जल की कमी खेती के लिए बड़ी समस्या है। फसल बीमा योजना को सरल और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि प्राकृतिक आपदा के समय किसान को आर्थिक सहायता मिल सके। इसके अतिरिक्त कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने से किसानों को अतिरिक्त आय के स्रोत मिल सकते हैं।

सरकार को कृषि शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए। किसानों को आधुनिक खेती की जानकारी देना आवश्यक है, जिससे उत्पादन बढ़ सके और लागत कम हो। जैविक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि भूमि की उर्वरता बनी रहे और पर्यावरण को भी नुकसान न पहुँचे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन की सुविधाओं का विकास भी किसान के जीवन स्तर को सुधार सकता है।

नवयुवा वर्ग किसान की स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आज का युवा शिक्षित है और तकनीक का ज्ञान रखता है। यदि युवा कृषि को अपनाए और आधुनिक तकनीक का उपयोग करे तो खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है। ड्रोन, मोबाइल ऐप, मौसम पूर्वानुमान और नई मशीनों का उपयोग करके खेती को अधिक उत्पादक बनाया जा सकता है। युवा यदि स्टार्टअप के माध्यम से कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण और विपणन करें तो किसानों को अधिक लाभ मिल सकता है। इसके अतिरिक्त युवाओं को किसान के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना चाहिए और समाज में किसान के महत्व को समझाना चाहिए।

भविष्य की संभावनाओं की दृष्टि से कृषि क्षेत्र में अनेक अवसर मौजूद हैं। जैविक खेती, औषधीय पौधों की खेती, बागवानी, डेयरी उद्योग और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में विकास की अपार संभावनाएँ हैं। यदि कृषि को उद्योग से जोड़ा जाए तो किसानों की आय बढ़ सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसान सीधे उपभोक्ताओं तक अपनी उपज पहुँचा सकते हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम होगी। स्मार्ट खेती और वैज्ञानिक पद्धतियों के उपयोग से उत्पादन में वृद्धि संभव है।

किसान बच्चों के भविष्य पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। यदि किसान के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी तो वे अपने जीवन को बेहतर बना सकेंगे। शिक्षा के माध्यम से वे आधुनिक तकनीक को समझ सकेंगे और अपने माता-पिता की खेती को अधिक उन्नत बना सकेंगे। सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए ताकि किसान के बच्चे भी डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और वैज्ञानिक बन सकें। साथ ही यदि वे कृषि क्षेत्र में ही कार्य करना चाहें तो उन्हें आधुनिक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

किसान विमर्श केवल किसान की समस्याओं का वर्णन नहीं है, बल्कि यह समाज की संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। यदि समाज किसान के महत्व को समझे और उसे उचित सम्मान दे, तो किसान का मनोबल बढ़ेगा। किसान का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि नीतियों और व्यवहार से होना चाहिए। जब तक किसान की आय स्थिर नहीं होगी और उसका जीवन सुरक्षित नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का समग्र विकास संभव नहीं है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता है। उसकी स्थिति में सुधार करना केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। यदि सरकार प्रभावी नीतियाँ बनाए, समाज किसान को सम्मान दे और युवा कृषि को अपनाएँ, तो भविष्य में किसान की स्थिति निश्चित रूप से बेहतर हो सकती है। किसान का सशक्त होना राष्ट्र के सशक्त होने का प्रतीक है। जब किसान खुशहाल होगा, तभी देश समृद्ध होगा और विकास का वास्तविक अर्थ पूर्ण होगा।

© आरती कुशवाहा
(छात्रा – दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)
06 अप्रैल 2026, दिल्ली