दतिया : नरोत्तम मिश्रा के आंसू , भावनाओं, समर्पण और राजनीति का अद्भुत संगम ( रिपोर्ट : अखंड प्रताप सिंह )

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दतिया : नरोत्तम मिश्रा के आंसू , भावनाओं, समर्पण और राजनीति का अद्भुत संगम ( रिपोर्ट : अखंड प्रताप सिंह )

दतिया की राजनीति में 13 जुलाई 2026 का दिन एक भावुक दृश्य के कारण लंबे समय तक याद रखा जाएगा। मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री और दतिया की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे डॉ. नरोत्तम मिश्रा भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के नामांकन कार्यक्रम में मंच पर भावुक हो गए। भाषण के दौरान उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और कुछ समय के लिए वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सके।

नरोत्तम मिश्रा का दतिया से रिश्ता केवल एक विधायक का नहीं, बल्कि दशकों से जनता के विश्वास और राजनीतिक नेतृत्व का रहा है। वे कई बार दतिया का प्रतिनिधित्व करते रहे और प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली नेता व गृह मंत्री जैसे पद पर सुशोभित रहे है इस उपचुनाव में उन्हें टिकट का प्रमुख दावेदार माना जा रहा था, लेकिन भाजपा ने आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। इसके बावजूद उन्होंने संगठन को सर्वोपरि मानते हुए मंच से प्रत्याशी के पक्ष में पूरी ताकत से चुनाव लड़ने का संकल्प लिया। इसी दौरान भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा और उनकी आंखें नम हो गईं।

टिकट की घोषणा के बाद दतिया में उनके समर्थन में जिस तरह बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक सड़कों पर उतरे, कई स्थानों पर जाम जैसी स्थिति बनी और लोगों ने खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं, उसे उनके जनाधार और लोकप्रियता के संकेत के रूप में भी देखा गया। यह घटनाक्रम बताता है कि वर्षों की राजनीतिक सक्रियता और जनता से निरंतर जुड़े रहने का प्रभाव आज भी उनके समर्थकों के बीच स्पष्ट दिखाई देता है।

इन आंसुओं को केवल टिकट न मिलने की प्रतिक्रिया मानना अधूरा आकलन होगा। यह उस नेता की भावनात्मक अभिव्यक्ति भी थी जिसने दतिया के विकास को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। उनके कार्यकाल में दतिया मेडिकल कॉलेज की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई, दतिया एयरपोर्ट परियोजना को गति मिली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत संरचना के अनेक विकास कार्य हुए। दतिया को प्रदेश के विकास के नक्शे पर नई पहचान दिलाने के प्रयासों का उल्लेख उनके समर्थक आज भी करते हैं।

प्रदेश की राजनीति में भी डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2020 में कमलनाथ सरकार के राजनीतिक संकट के दौरान वे भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने गए। कांग्रेस के कई विधायकों के इस्तीफों और उसके बाद बने राजनीतिक घटनाक्रम में उन्होंने संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाई। भाजपा नेतृत्व के साथ समन्वय और राजनीतिक प्रबंधन में उनकी भूमिका को व्यापक रूप से महत्वपूर्ण माना गया, जिसके बाद मध्य प्रदेश में भाजपा की सत्ता में वापसी हुई। हालांकि उस पूरे घटनाक्रम को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी व्याख्याएं और दावे रहे हैं।

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में, विधानसभा चुनाव हारने और सरकार में शामिल न होने के बावजूद, डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने स्वयं को संगठनात्मक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में लगातार दौरे किए, कार्यकर्ता बैठकों को संबोधित किया, चुनावी रणनीति बनाने में सहयोग दिया और भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में व्यापक प्रचार किया। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी उन्हें कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रचार और संगठनात्मक समन्वय की जिम्मेदारियां सौंपीं। भाजपा की मध्य प्रदेश में सभी 29 लोकसभा सीटों पर जीत के अभियान में उनके प्रयासों को पार्टी के भीतर उल्लेखनीय माना गया।

डॉ. मिश्रा की पहचान केवल एक चुनावी नेता की नहीं, बल्कि भाजपा संगठन के संकटमोचक नेताओं में भी रही है। विधानसभा के भीतर उनकी मुखर शैली, विपक्ष पर तीखे राजनीतिक हमले, संगठन के प्रति निष्ठा और कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में सक्रिय भूमिका ने उन्हें प्रदेश की राजनीति में विशिष्ट स्थान दिलाया है।

दतिया के मंच पर छलके उनके आंसुओं में वर्षों का राजनीतिक संघर्ष, कार्यकर्ताओं का स्नेह, जनता का विश्वास, क्षेत्र के प्रति लगाव और संगठन के प्रति समर्पण—सभी भाव एक साथ दिखाई दिए। राजनीति को अक्सर केवल सत्ता और रणनीति का खेल माना जाता है, लेकिन इस घटना ने यह भी दिखाया कि सार्वजनिक जीवन में संवेदनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं।

भले ही भारतीय जनता पार्टी ने दतिया उपचुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा को दरकिनार करने का निर्णय लिया हो और इसके पीछे संगठनात्मक रणनीति तथा आंतरिक आकलन जैसे कारण बताए गए हों, लेकिन उनके राजनीतिक योगदान को नकारा नहीं जा सकता। दतिया के विकास में उनकी भूमिका, प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव, वर्ष 2020 के राजनीतिक घटनाक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी तथा 2024 के लोकसभा चुनाव में संगठन के लिए किए गए उनके प्रयास उन्हें मध्य प्रदेश भाजपा के प्रमुख नेताओं में स्थान दिलाते हैं। राजनीतिक फैसले समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन वर्षों की सेवा, संघर्ष और जनविश्वास से अर्जित विरासत को इतिहास आसानी से नहीं भूलता।

दतिया के उपचुनाव का परिणाम जो भी हो, लेकिन मंच पर भावुक हुए डॉ. नरोत्तम मिश्रा के आंसू मध्य प्रदेश की राजनीति में एक ऐसे क्षण के रूप में याद किए जाएंगे, जिसने यह एहसास कराया कि राजनीति केवल पद और सत्ता का नहीं, बल्कि समर्पण, संघर्ष, रिश्तों और जनता के विश्वास का भी नाम है।